
बॉलीवुड के इतिहास में 26 जुलाई 1982 का दिन एक काले अध्याय के रूप में दर्ज है। बेंगलुरु में फिल्म ‘कुली’ की शूटिंग के दौरान एक ऐसा हादसा हुआ जिसने न केवल फिल्म इंडस्ट्री, बल्कि पूरे भारत को हिलाकर रख दिया था।
हादसे का वो खौफनाक मंजर
यूनिवर्सिटी कैंपस में एक फाइट सीन फिल्माया जा रहा था। विलेन का किरदार निभा रहे पुनीत इस्सर को अमिताभ के पेट पर मुक्का मारना था और अमिताभ को एक मेज पर गिरना था। टाइमिंग की एक मामूली चूक हुई और मेज का कोना अमिताभ के पेट के निचले हिस्से में जोर से लग गया। शुरुआत में उन्होंने दर्द को मामूली समझा, लेकिन कुछ ही घंटों में उनकी हालत बिगड़ने लगी।
जब डॉक्टरों ने कह दिया था ‘क्लीनिकली डेड’
उनकी आंतें फट चुकी थीं और जहर पूरे शरीर में फैल रहा था। मुंबई के ब्रीच कैंडी अस्पताल में इलाज के दौरान एक वक्त ऐसा आया जब डॉक्टरों ने उन्हें ‘क्लीनिकली डेड’ घोषित कर दिया था। कहा जाता है कि डॉ. वाडिया ने उनके पैर के अंगूठे में हरकत देखी और अंतिम कोशिश के तौर पर उनके दिल में एड्रेनालाईन इंजेक्शन लगाया, जिसके बाद उनकी सांसें वापस लौटीं।
प्रशंसकों की अटूट श्रद्धा
अमिताभ बच्चन की सलामती के लिए पूरा देश सड़कों पर उतर आया था। मंदिरों, मस्जिदों और गुरुद्वारों में चौबीसों घंटे प्रार्थनाएं होने लगीं। कई प्रशंसकों ने तो उनके लिए अपने अंगों तक की मन्नत मांग ली थी। इसी हादसे के बाद उन्हें ‘सेंकंड लाइफ’ (दूसरा जीवन) मिलने की बात कही जाती है।
फिल्म में बदलाव
इस हादसे के प्रति दर्शकों की संवेदना इतनी गहरी थी कि निर्देशक मनमोहन देसाई ने फिल्म का अंत ही बदल दिया। मूल स्क्रिप्ट के अनुसार फिल्म के क्लाइमेक्स में ‘इकबाल’ (अमिताभ का किरदार) को मरना था, लेकिन असल जिंदगी में मौत को मात देकर लौटे ‘शहंशाह’ के सम्मान में उन्हें फिल्म में भी जीवित दिखाया गया।
