लेखिका: चंदा पंवार झाबुआ
होली एकता और भाईचारे का प्रतीक है। यह सभी त्योहारों में सबसे सस्ता त्योहार है, जिसमें लाखों का खर्च नहीं होता; बस कुछ रंग, कुछ फूल, साधारण वेशभूषा और मन में अपने आराध्य, देश, संबंधियों, भाई-बंधुओं तथा विरोधियों के प्रति अथाह प्रेम की भावना होती है। मनुष्य के मन के हर मैल को धोने वाली यह रंगारंग होली है।
हिंदू पंचांग के अनुसार, फाल्गुन मास की पूर्णिमा को होलिका दहन के बाद, कृष्ण पक्ष की प्रतिपदा के दिन रंगों वाली होली खेली जाती है, जिसे ‘धुलेंडी’ भी कहा जाता है। होली मनाने का मुख्य कारण बुराई पर अच्छाई की जीत है; यह विश्व शांति का संदेश देने वाला प्रेरक त्योहार है। इसी दिन वैष्णव संप्रदाय के श्री चैतन्य महाप्रभु का जन्म भी माना जाता है।
क्यों मनाई जाती है होली?
अब प्रश्न यह आता है कि रंगों का यह खूबसूरत त्योहार, जो प्रेम और एकता से जुड़ा है, सर्वप्रथम किसने मनाया था? पौराणिक कथाओं के अनुसार, सबसे पहले होली देवताओं द्वारा मनाई गई थी। यह प्रसंग भगवान शिव, कामदेव और रति से जुड़ा है। माता सती के वियोग में भगवान शिव ने वैराग्य धारण कर लिया था। शिव जी का ध्यान माता पार्वती की ओर आकर्षित करने हेतु देवताओं के कहने पर कामदेव और रति ने उनकी तपस्या भंग की, जिससे क्रोधित होकर शिव जी ने कामदेव को भस्म कर दिया। बाद में रति की प्रार्थना पर शिव जी ने कामदेव को पुनः जीवित किया। इस खुशी में देवी-देवताओं ने फाल्गुन पूर्णिमा पर देवलोक में रंगोत्सव मनाया। तभी से होली की शुरुआत मानी जाती है।
अन्य पौराणिक कथा के अनुसार, होली मुख्य रूप से भक्त प्रहलाद, हिरण्यकश्यप और होलिका दहन की घटना से जुड़ी है। विष्णु भक्ति में लीन प्रहलाद को मारने हेतु जब पिता हिरण्यकश्यप के सभी प्रयत्न विफल रहे, तब उसने अपनी बहन होलिका की सहायता ली, जिसे अग्नि में न जलने का वरदान प्राप्त था। होलिका भक्त प्रहलाद को लेकर जलती आग में बैठ गई, लेकिन भगवान की कृपा से प्रहलाद सुरक्षित बच गए और होलिका जलकर भस्म हो गई। असत्य पर सत्य की इस जीत के पश्चात से ही इस दिन को रंगों, फूलों और हरि-नाम के भजनों के साथ मनाया जाता है।
सांस्कृतिक विविधता और प्रेम
होली और फाग उत्सव के लिए राधा-कृष्ण की प्रेम लीलाएं भी जगप्रसिद्ध हैं। होली में प्रेम, उल्लास, प्रकृति के प्रति आभार और भक्ति की भावना निहित होती है। इसके माध्यम से लोकगीत, पारंपरिक भगोरिया उत्सव और फागोत्सव मनाए जाते हैं। पुरानी गलतियों को भुलाकर नए सिरे से संबंध स्थापित करना और सामाजिक कुरीतियों को तोड़कर जीवन में उल्लास भरना ही इसका उद्देश्य है।
क्षेत्रीय विविधताओं के मामले में होली निस्संदेह भारतीय संस्कृति को बढ़ावा देने वाला त्योहार है। वृंदावन में फूलों की होली उत्साह के चरम पर होती है, जो दुनिया भर के पर्यटकों को आकर्षित करती है। वहीं, मथुरा की ‘लठमार होली’ अपनी अनूठी परंपरा के कारण प्रसिद्ध है। इसके अतिरिक्त देश के विभिन्न हिस्सों में इसे शिग्मो, रंगपंचमी, होला मोहल्ला, डोल उत्सव, फगुआ, बैठकी या खड़ी होली, मंजल कुली और फागवा आदि नामों से मनाया जाता है।
भगोरिया उत्सव का महत्व
होली के पूर्व ‘भगोरिया उत्सव’ का स्थानीय लोगों के लिए विशेष महत्व है। रंगारंग पोशाकें, ढोल-मांदल की थाप, पारंपरिक हाट-बाजार और टैटू गुदवाना इसके मुख्य आकर्षण हैं। भगोरिया मुख्य रूप से मध्य प्रदेश के झाबुआ, अलीराजपुर और बड़वानी में निवासी भील और भिलाला जनजाति का प्रमुख सांस्कृतिक उत्सव है। इसमें हर संप्रदाय के लोग आनंदित होते हैं। इस उत्सव में युवक-युवतियां अपनी पसंद से जीवनसाथी का चयन भी करते हैं।
होली का मुख्य अंग ‘फाग गायन’ है। यह ऊर्जापूर्ण लोक गायन शैली है, जिसमें दो समूह बारी-बारी से छंदों का पाठ करते हैं। इसकी विषय-वस्तु कृष्ण भक्ति और लोक कथाओं पर केंद्रित होती है। शास्त्रीय संगीत में भी फाग, ध्रुपद और लोक संगीत का अनूठा संगम देखने को मिलता है।
एक संदेश
होली के दौरान कुछ विसंगतियां भी सामने आती हैं, जैसे जबरदस्ती रंग लगाना, लैंगिक दुर्व्यवहार या जातिगत टिप्पणियां, जो इसके मूल संदेश के विपरीत हैं। महिलाओं और हाशिए पर पड़े समुदायों के खिलाफ हिंसा या अजनबियों पर जबरन कीचड़-पानी फेंकना उत्सव की गरिमा को कम करता है। साथ ही, मूक पशुओं पर रंग या गुब्बारे फेंकना क्रूरता है। हमारा कर्तव्य है कि इन कुरीतियों को मिटाकर आने वाली पीढ़ियों को सही मार्गदर्शन दें और शालीनता के साथ यह पर्व मनाएं।
