(लेखक: डॉ. प्रदीप सिंह राव, अंतरराष्ट्रीय राजनीति के वरिष्ठ विश्लेषक)
ईरान के सर्वोच्च नेता आयतुल्ला खुमैनी की अमेरिका और इजरायल द्वारा बम हमले में हत्या के बाद लगभग 15 से 20 देशों में युद्ध की आग भड़क उठी है। ईरान के शिया नेता की हत्या के बाद विश्व भर में शिया समर्थकों और लगभग 30 से 35 करोड़ मुस्लिम आबादी वाले क्षेत्रों में भारी आक्रोश है। अमेरिका के अधिकांश सैन्य ठिकाने (Military Bases) सुन्नी बहुल देशों में स्थित हैं। सऊदी अरब के निकटवर्ती क्षेत्रों जैसे दोहा, कतर, दुबई, अबू धाबी, कुवैत और तेल अवीव जैसे स्थानों पर ईरान के हमलों का उद्देश्य अमेरिकी समर्थकों में भय पैदा करना है। ओमान पर हमला होना एक नई रणनीति का हिस्सा है, जिसका प्रभाव काफी गहरा पड़ेगा।
मनोवैज्ञानिक युद्ध की नीति
ईरान, अमेरिका और इजरायल पर सीधे आक्रमण करने के बजाय उनके सहयोगी देशों और शहरों को निशाना बना रहा है। वह बंदरगाहों, हवाई अड्डों, होटलों, बुर्ज खलीफा और तेल भंडारों को टारगेट कर रहा है। इस दबाव का प्रभाव पूरी दुनिया पर पड़ रहा है। खुमैनी की अनुपस्थिति में भी ईरान की युद्ध रणनीति को निश्चित रूप से चीन का समर्थन मिल रहा होगा। ईरान 13 ऐसे देशों से घिरा हुआ है जो अमेरिकी समर्थक मुस्लिम राष्ट्र हैं और ईरान के साथ नहीं हैं; इन देशों को अमेरिका से व्यापारिक लाभ का लालच है।
हॉर्मुज जलडमरूमध्य का रास्ता बंद
दुनिया का $20\%$ तेल ईरान की फारस की खाड़ी से सप्लाई होता है, जिसे अब रोक दिया गया है। यह मात्र 35 किलोमीटर चौड़ा रास्ता है। यहाँ ईरान समर्थक ‘हुती’ (विद्रोही और गुरिल्ला लड़ाके) सक्रिय हैं। ये ईरान के तेल हितों के रक्षक भी हैं और इसके बदले ईरान से बड़ी सहायता प्राप्त करते हैं। हॉर्मुज के रास्ते सऊदी अरब का 53 लाख बैरल तेल निर्यात होता है, जो अब रुक जाएगा। इससे इराक, यूएई, कुवैत और कतर—सभी पर संकट आएगा। चीन, भारत, दक्षिण कोरिया और जापान को इसी मार्ग से तेल प्राप्त होता है, जिससे वे बुरी तरह प्रभावित होंगे।
भारत पर बड़ा आर्थिक प्रभाव
भारत का 26 लाख बैरल तेल भी इसी मार्ग से आता है, साथ ही अन्य सामग्रियों का भी बड़ी मात्रा में आयात होता था। अतः भारत पर भी इसका प्रतिकूल प्रभाव पड़ेगा। ईरान के पास साधन सीमित हैं, इसलिए वह अपना पूरा गोला-बारूद खत्म होने तक लड़ेगा। अमेरिका से ईरान की दूरी 11,512.30 किलोमीटर है, फिर भी मध्य पूर्व के 11 देशों में अमेरिका के 50,000 से अधिक सैनिक तैनात हैं। इसी सैन्य शक्ति के दम पर उसने ईरान पर परमाणु हथियार न बनाने का दबाव बनाया है। इसी हठ में उसने धार्मिक गुरु की हत्या करने की बड़ी भूल की है।
दुनिया के शिया मुस्लिमों का आक्रोश
विश्व भर के शिया समुदायों का विरोध अमेरिका के लिए भारी पड़ेगा। पाकिस्तान सहित अन्य देशों में शिया मुस्लिमों का अमेरिका विरोधी विद्रोह पश्चिम एशिया में अशांति का बड़ा कारण बन सकता है। यदि शिया-सुन्नी तनाव और गहराया, तो अमेरिका का समर्थन संकट में पड़ जाएगा।
ईरान की यह घटना द्वितीय विश्व युद्ध की याद दिला रही है। 60 लाख यहूदियों की हत्या करने वाला हिटलर सनकी था; अब वर्तमान वैश्विक नेतृत्व भी उसी तरह बर्बादी की इबारत लिख रहा है। इस घटना के बाद अंतरराष्ट्रीय कानूनों और वैश्विक संयम को अन्य देश भी ताक पर रख सकते हैं। चीन, रूस और अन्य राष्ट्र भी मर्यादाएं तोड़ सकते हैं। दुनिया आज जंग के मुहाने पर खड़ी है और शिया देशों के भीतर इजरायल के विरुद्ध बदले की भावना सुलग रही है।
