इस वर्ष 14 महीने से अधिक चलेगी कठिन तप साधना
अगले वर्ष अक्षय तृतीया तक रहेगा उपवास-आहार का क्रम
आचार्य डॉ. शिव मुनि 20 अप्रैल को पूर्ण करेंगे 41वाँ वर्षीतप; 42वें में करेंगे प्रवेश
Ratlam जैन धर्म की तप परंपरा में अत्यंत महत्वपूर्ण माने जाने वाले वर्षीतप के संकल्प इस वर्ष चैत्र कृष्ण अष्टमी (बुधवार, 11 मार्च 2026) को लिए जाएंगे। यह पावन दिन प्रथम तीर्थंकर भगवान आदिनाथ के जन्म कल्याणक के रूप में भी श्रद्धा के साथ मनाया जाता है। इस अवसर पर जैन समाज के साधु-साध्वी और श्रावक-श्राविकाएँ वर्षीतप का संकल्प लेकर अपनी साधना का आरंभ करेंगे। संकल्प के पश्चात साधक अगले वर्ष अक्षय तृतीया तक उपवास और संयम के कठोर नियमों का पालन करेंगे।
जैन धर्म में वर्षीतप को सबसे कठिन और पुण्यदायी तप माना जाता है। श्रद्धालु इसे केवल दैहिक उपवास नहीं, बल्कि आत्मसंयम, त्याग और आत्मशुद्धि की महान साधना मानते हैं।
तप का स्वरूप: एक दिन उपवास, एक दिन आहार
इस तप का नियम अत्यंत अनुशासनबद्ध होता है। इसमें साधक पूरे वर्ष (और इस बार 14 माह) एक विशेष क्रम का पालन करते हैं: एक दिन पूर्ण उपवास और दूसरे दिन आहार (बेयणा)।
यह क्रम निरंतर चलता रहता है। साधक इस दौरान अपने भोजन, वाणी, विचार और आचरण में पूर्ण संयम रखते हैं। इस तप का मुख्य उद्देश्य केवल शारीरिक कष्ट सहना नहीं, बल्कि इंद्रियों पर विजय प्राप्त करना और मन की स्थिरता है।
23 प्रकार के त्याग और नियम
वर्षीतप के दौरान साधक अपनी रसना (जीभ) पर नियंत्रण रखने के लिए लगभग 23 प्रकार के खाद्य पदार्थों का त्याग करते हैं। इनमें मुख्य रूप से शामिल हैं:
- बासी भोजन, जमीकंद (कंदमूल), बहुबीज वाले फल/सब्जियाँ।
- अधिक मसालेदार और तामसिक आहार का पूर्ण त्याग।
अन्य धार्मिक नियम: - सूर्यास्त के बाद जल ग्रहण न करना (चौविहार)।
- प्रतिदिन सुबह-शाम प्रतिक्रमण और गुरु वंदन करना।
- स्वाध्याय, ध्यान और आत्म-चिंतन में समय बिताना।
प्रेरणास्रोत: 41 वर्षीतप की अनूठी साधना
स्थानकवासी जैन श्रमण संघ के चतुर्थ आचार्य डॉ. शिव मुनि जी इस क्षेत्र में महान प्रेरणास्रोत हैं। आगामी 20 अप्रैल को वे अपना 41वाँ वर्षीतप पूर्ण कर 42वें वर्षीतप में प्रवेश करेंगे। इतने लंबे समय तक निरंतर वर्षीतप करने वाले वे जैन समाज के एकमात्र आचार्य हैं। उनके साथ ही हज़ारों की संख्या में अन्य साधु-संत और श्रावक भी इस मार्ग पर अग्रसर हैं।
ऐतिहासिक संदर्भ: 13 महीने तक नहीं मिला था पारणा
जैन मान्यताओं के अनुसार, जब भगवान आदिनाथ ने दीक्षा ली, तब उन्होंने गन्ने के रस से पारणा करने का संकल्प लिया था। चूँकि उस समय लोगों को पारणा की विधि ज्ञात नहीं थी, इसलिए भगवान को लगभग 13 महीने तक आहार (पारणा) प्राप्त नहीं हुआ और वे निरंतर तपस्यारत रहे।
अंततः हस्तिनापुर में राजा श्रेयांस कुमार ने उन्हें गन्ने का रस (इक्षुरस) प्रतिलाभित कराकर पारणा कराया। इसी ऐतिहासिक स्मृति में आज भी अक्षय तृतीया के दिन वर्षीतप का पारणा इक्षुरस से किया जाता है।
अधिकमास के कारण बढ़ी अवधि
धार्मिक पंचांग के अनुसार, वर्ष 2026 में अधिकमास (लौंद का महीना) होने के कारण तप की अवधि बढ़ गई है। इस वर्ष ज्येष्ठ मास दो बार आएगा (सामान्य ज्येष्ठ और अधिक ज्येष्ठ)। अधिकमास 17 मई से 15 जून 2026 तक रहेगा, जिससे इस बार वर्षीतप की अवधि लगभग 14 महीने से अधिक की होगी।
आत्मशुद्धि का महापर्व
श्रमण डॉ. पुष्पेंद्र ने बताया कि वर्षीतप केवल एक शारीरिक क्रिया नहीं, बल्कि आध्यात्मिक उन्नति का महापर्व है। आज के भौतिकवादी युग में भी हज़ारों श्रद्धालुओं का इस कठिन साधना को चुनना यह दर्शाता है कि आत्मबल और आस्था के द्वारा किसी भी कठिन लक्ष्य को प्राप्त किया जा सकता है।
