बदनावर। “जय गुरु उमेश, जय गुरु जिनेन्द्र” के मंगल उद्घोष के साथ पूज्या वात्सल्य मूर्ति महासती श्री मधुबाला जी म.सा. की 46वीं दीक्षा जयंती बदनावर में श्रद्धा, त्याग और तपस्या के साथ मनाई गई। इस अवसर पर धर्मसभा एवं विशेष आराधना का आयोजन किया गया।
पूज्या महासती सुनीता जी म.सा. ने अपने प्रेरक उद्बोधन में कहा कि पूज्या श्री मधुबाला जी म.सा. में अपार वात्सल्य भाव है। वे सदैव साधना में लीन रहते हुए सभी का मार्गदर्शन करती हैं। उन्होंने कहा कि आज वे 46वीं दीक्षा जयंती पूर्ण कर 47वें वर्ष में प्रवेश कर रही हैं। उनके उज्ज्वल भविष्य एवं सतायु होने की मंगलकामना करते हुए उन्होंने जिनशासन की प्रभावना निरंतर करते रहने की भावना व्यक्त की।
उन्होंने आगे कहा कि चाहे धर्म का मार्ग हो या संसार का, बिना कारण राजनीति या अनावश्यक सलाह नहीं देनी चाहिए। आज समाज में बिना पूछे राय देने की प्रवृत्ति बढ़ती जा रही है, जो उचित नहीं है। यदि कोई धर्म, सामायिक, प्रतिक्रमण एवं साधना में रुचि लेता है तो उसे संदेह की दृष्टि से नहीं देखना चाहिए। दीक्षा का भाव आना कोई गलत बात नहीं, बल्कि यह परिग्रह से दूर होकर मोक्षमार्ग की ओर बढ़ने का संकेत है।
पूज्या महासती श्रद्धा जी म.सा. ने अपने प्रवचन में कहा कि सामान्य जीवन तो सभी जीते हैं, परंतु सच्चा जीवन वही है जिसमें त्याग का समावेश हो। परिग्रह असार है और कर्म प्रधान हैं। कर्म उदय में आने पर उन्हें भोगना ही पड़ता है। उन्होंने कहा कि परिग्रह को कम करने के लिए समय-समय पर प्रत्याख्यान लेना आवश्यक है। परिग्रह की अधिक आसक्ति रिश्तों में दरार पैदा करती है, इसलिए इसे सीमित करना चाहिए।
दीक्षा जयंती के अवसर पर तीसरे दिवस लगभग 115 श्रद्धालुओं द्वारा एकासन की आराधना की गई। पूज्या महासती जी की प्रेरणा से यहां निरंतर धार्मिक आराधना जारी है।
कार्यक्रम की जानकारी राजेश बाफना द्वारा प्रदान की गई।
