अलका रसोई में आई। उसने देखा कि सिंक में सुबह के कुछ बर्तन अभी भी पड़े थे। विनय चाहते तो उन्हें हटा सकते थे, पर ‘पुरुषार्थ’ शायद इन छोटे कामों की इजाजत नहीं देता था।
— पंकज व्यास
रतलाम की सर्द शाम और कालिका माता मंदिर की घंटियों की गूँज के बीच, अलका अपने घर की बालकनी में खड़ी चाय का घूँट भर रही थी। सामने की सड़क पर चहल-पहल थी, पर अलका के मन के भीतर एक अजीब सी खामोशी पसरी हुई थी। वह खामोशी, जो बरसों से ‘एडजस्टमेंट’ और ‘समझदारी’ की तहों के नीचे दबी हुई थी।
अलका एक सरकारी स्कूल में शिक्षिका थी। पूरे दिन बच्चों को भविष्य के सपने दिखाना और शाम को घर लौटकर वही घिसी-पिटी जिंदगी जीना—यही उसका ढर्रा था। पति विनय बुरे आदमी नहीं थे, बस उन्हें यह लगता था कि घर की शांति का सारा ठेका केवल अलका ने ले रखा है।
”अलका, वो मेरी ब्लू वाली फाइल कहाँ है? और सुनो, आज शाम को पंकज जी और उनका परिवार खाने पर आ रहे हैं, जरा देख लेना,” विनय ने हॉल से आवाज लगाई।
अलका रसोई में आई। उसने देखा कि सिंक में सुबह के कुछ बर्तन अभी भी पड़े थे। विनय चाहते तो उन्हें हटा सकते थे, पर ‘पुरुषार्थ’ शायद इन छोटे कामों की इजाजत नहीं देता था। अलका ने फाइल थमाई और धीमी आवाज में कहा, “आज मेरा साहित्य अकादमी वाला कार्यक्रम है, मैंने बताया था न आपको? मुझे एक कहानी पढ़नी है वहां।”
विनय ने घड़ी देखी और बिना सिर उठाए बोले, “अरे, वो तो कल भी हो सकता है। आज मेहमान आ रहे हैं, अब तुम बाहर जाओगी तो अच्छा थोड़े ही लगेगा? वैसे भी, ये कहानियाँ लिखकर क्या मिल जाएगा?”
’क्या मिल जाएगा?’—यही वह सवाल था जो अलका के भीतर की स्त्री को हर बार छलनी कर देता था।
उसने चाय का खाली कप सिंक में रखा। आज उसने तय कर लिया था कि वह चुप नहीं रहेगी। उसने अलमारी से अपनी सबसे प्रिय चंदेरी साड़ी निकाली और तैयार होने लगी।
विनय कमरे में आए, उसे तैयार होता देख चकित रह गए। “ये क्या? तुम सच में जा रही हो?”
अलका ने बड़ी सहजता से अपनी डायरी उठाई और बोली, “विनय, बरसों से मैं तुम्हारी मेहमानों की पसंद के खाने बना रही हूँ। आज मैं अपनी पसंद का एक पन्ना जीने जा रही हूँ। मेहमान तुम्हारे हैं, तो आतिथ्य भी तुम्हारा ही होना चाहिए। फ्रिज में सब कुछ है, बस दिल बड़ा करने की जरूरत है।”
जब अलका घर की दहलीज पार कर रही थी, तो उसे लगा जैसे बरसों का बोझ उसके कंधों से उतर गया हो। वह जानती थी कि आज घर लौटने पर उसे तंज मिलेंगे, शायद नाराजगी भी। पर उसे यह भी पता था कि आज के बाद विनय उसे ‘उपलब्ध’ (Available) की श्रेणी में नहीं रखेंगे।
उस शाम साहित्य अकादमी के मंच पर जब अलका ने अपनी कहानी पूरी की, तो तालियों की गड़गड़ाहट के बीच उसे अपनी पहचान की नई गूँज सुनाई दी। वह समझ गई थी कि स्त्री जब तक खुद को कमतर आंकना नहीं छोड़ती, समाज उसे बराबर का दर्जा कभी नहीं देगा।
रात को जब वह घर लौटी, तो घर का मंजर बदला हुआ था। विनय ने खाना ऑर्डर कर दिया था और मेहमानों के साथ खुद ही मोर्चा संभाले हुए थे। अलका की आँखों में नाराजगी नहीं, बल्कि एक विजय की चमक थी।
