रमेश मिश्रा ‘चंचल’
रतलाम सिर्फ एक शहर नहीं अपितु मालवा के दिल की धड़कन है। अपने स्थापना काल से लगाकर आज तक रतलाम में सोना केवल धातु के रूप में नहीं बल्कि संस्कृति की तरह रचा – बसा है। ज्वेलरी की अपनी शुद्धता, डिजाइन की सादगी और पारंपरिक विश्वसनीयता के कारण रतलाम न सिर्फ मध्यप्रदेश अपितु सीमावर्ती प्रांतों राजस्थान और गुजरात से आगे देश – विदेश तक अलग पहचान रखता है। शादी-ब्याह से लेकर निवेश तक रतलाम के स्वर्ण आभूषनों को भरोसे का दूसरा नाम माना जाता है।
प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से करीब 500 से अधिक ज्वेलर्स, हजारों कर्मचारी और कई सौ करोड़ रुपये का सालाना कारोबार इस उद्योग से जुड़ा है। लेकिन इस चमकदार तस्वीर के पीछे एक कड़वी सच्चाई भी छिपी है। रतलाम में सोना है, बाजार है और ग्राहक भी हैं। लेकिन स्थानीय स्वर्ण आभूषण कारीगर जरुरत के अनुसार लगभग नहीं के बराबर हैं।
आज अधिकांश ज्वेलरी निर्माण बंगला – भाषी कारीगरों पर निर्भर है। आज रतलाम में लगभग सात हज़ार कारीगर रह रहे है।
इसका खामियाजा व्यवसायी उठा रहा है। हर साल कई कारीगर रकम बनाने के नाम पर मिला सोना लेकर बंगाल की और फरार हो जाते है। पुलिस भी इनको ढूंढने में विफल रहती है। इस तरह कारीगर बनकर ठगी करने वाले बाजार को लाखों करोड़ों का नुकसान दे रहे है। बात यह है की रतलाम के स्वर्ण आभूषण बाज़ार की चर्चा तो बहुत होती है। लेकिन स्थानीय लोगो के लिए यह बाज़ार रोजगार के नाम पर आज की स्थिति में लगभग शून्य है। मतलब पैसा और रोजगार दोनों बाहर चला जा रहा है।
हर घर में एक कारखाना — सपना नहीं, संभावनाअगर सही योजना बने तो रतलाम में “हर घर एक स्वर्ण कारीगर” मॉडल संभव है। जैसे कभी कपड़ा बुनाई या अगरबत्ती निर्माण घर-घर होता था। वैसे ही रतलाम के हर घर को माइक्रो ज्वेलरी यूनिट्स के रूप में बदला जा सकता हैं। छोटे उपकरण डिजिटल डिजाइन और प्रशिक्षित हाथ बस यही चाहिए। महिलाएँ घर से काम कर सकती हैं।युवा नौकरी ढूंढने नहीं ऑर्डर लेने लगेंगे।यह घरेलू उद्योग नहीं,घरेलू उद्यमिता होगी। जैसे कभी कपड़ा बुनाई या अगरबत्ती निर्माण घर-घर होता था। वैसे ही रतलाम के हर घर को माइक्रो ज्वेलरी यूनिट्स के रूप में बदला जा सकता हैं।
ज्वेलरी स्किल वैली की जरुरत
रतलाम को ज्वेलरी हब बनाने की दिशा में पहला कदम क्या होना चाहिए? रतलाम में सर्वप्रथम एक ज्वेलरी स्किल एंड डिजाइन सेंटर की स्थापना की बड़ी जरुरत है। जहाँ स्वर्ण आभूषण निर्माण, CAD ज्वेलरी डिजाइन के साथ पॉलिशिंग और फिनिशिंग और क्वालिटी कंट्रोल डिजिटल मार्केटिंग विषय के अध्यापन की सुविधा हो। साथ में इस उद्योग को एक बड़े मुकाम तक ले जाने के लिए माइक्रो फाइनेंस, टूल सब्सिडी और स्थानीय ब्रांड प्रमोशन की ट्रेनिंग के उच्चत्तर स्तर के पाठ्यक्रम शुरू होना चाहिए। यह नई पीढ़ी के उद्यमी पैदा करेगा। किसी नए केंद्र की स्थापना खर्च से बचने के लिए रतलाम के आईटीआई कॉलेज को इस केंद्र में तब्दील किया जा सकता है।
सरकार, व्यापारी और समाज तीनों की साझा जिम्मेदारी
सरकार ने रतलाम नगर निगम के सामने की भूमि गोल्ड काम्प्लेक्स को देकर जो पहल की है वह प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जी का दिव्य स्वप्न है, जिसे पूरा करने में रतलाम के कुख्यात जमीनखोर ने लालच देकर सरकारी उल्लेखित ज़मीन को निजी दर्शा कर सिविल विवाद को जन्म दिया हैविधानसभा में में प्रश्न भी लगा कर सर्वोच्च न्यायालय में विवाद और निजी होने का उल्लेख किया गया था,जिसे साक्ष्य के अभाव में न्यायालय ने कई बार अवसर प्रदान किया किन्तु साक्ष्य प्रस्तुत नहीं कर पाने पर दावेदारों के आवेदन को खारिज कर दिया है, गोल्ड काम्प्लेक्स को विलंबित करने के लिए रतलाम के जमीनों के खिलाड़ी सुराणा एवं दो अन्य ने दोनों दावेदारों के परिवारों से बड़ी लालच देकर अनुबंध पत्र , और मुख्यारनामा, सौदा चिठ्ठी बनवाई है और इंदौर में 35 लाख रुपए लेकर जो धोखा किया था,अब इंदौर पुलिस और न्यायालयीन कार्यवाही रतलाम में पुलिस और न्यायालय में शिफ्ट हो गई हैं। अब समदाड़ीया ग्रुप को तेज रफ्तार से गोल्ड काम्प्लेक्स को मूर्त रूप देना चाहिए और व्यापारी ट्रेनिंग और मार्केट और समाज अपने बच्चों को हुनर की ओर मोड़े। तभी रतलाम सिर्फ व्यापार केंद्र नहीं, निर्माण का बड़ा केंद्र बनेगा।
रतलाम के पास सब कुछ है
परंपरा, बाजार और भरोसा रतलाम के सोने की चमक को वैश्विक व्यापारिक हब में बदल सकती है। कमी है सिर्फ दृष्टि और संरचना की। अगर आज बीज बोया गया तो आने वाले सौ वर्षों में रतलाम मालवा का “ज्वेलरी कैपिटल” बन गया है। यह कोई सपना नहीं, सही नीति से संभव होने जैसा भविष्य है।
