लेखक: वाहिद खांन पठान (समाचार प्रतिनिधि, सामाजिक चिंतक एवं यूट्यूबर)
26 जनवरी 2026 को भारत अपने गणतंत्र की 76वीं वर्षगांठ मना रहा है। यह वह अवसर है जब हम उस महान संविधान को नमन करते हैं जिसे 26 जनवरी 1950 को लागू किया गया था। भारतीय विद्वानों द्वारा रचित हमारा संविधान विश्व के श्रेष्ठतम दस्तावेजों में से एक है, जो नागरिकों को न केवल अधिकार देता है, बल्कि कर्तव्यों का बोध भी कराता है। परंतु, साढ़े सात दशकों के बाद आज आत्मचिंतन की आवश्यकता है कि क्या संविधान का लाभ समाज के अंतिम व्यक्ति तक पहुँचा है?
स्तंभों के बीच वर्चस्व की जंग
संविधान ने विधायिका, कार्यपालिका और न्यायपालिका की सीमाएं स्पष्ट की थीं। लोकतंत्र का चौथा स्तंभ ‘मीडिया’ भी इसमें अपनी भूमिका निभाता था। लेकिन आज स्थिति चिंताजनक है:
संस्थागत संघर्ष: आज तीनों प्रमुख अंगों में समन्वय के स्थान पर व्यक्तिगत वर्चस्व की होड़ दिखाई देती है।
भ्रष्टाचार का साया: न्यायपालिका, जिसकी निष्पक्षता पर देश टिकता है, आज स्वयं सवालों के घेरे में है। हाल के दिनों में न्यायिक अधिकारियों के ठिकानों से मिली अकूत संपत्ति ने जनता के विश्वास को झकझोर दिया है।
कॉरपोरेट मीडिया: पत्रकारिता का एक बड़ा हिस्सा आज कॉरपोरेट जगत के नियंत्रण में है, जिससे जनसरोकार के मुद्दे गौण होते जा रहे हैं।
अमीरी-गरीबी की गहरी होती खाई
76 वर्षों बाद भी देश दो स्पष्ट वर्गों में विभाजित नजर आता है। एक ओर वह वर्ग है जिसके पास सुख-सुविधाओं का अंबार है, और दूसरी ओर वह ‘आम आदमी’ है जो बुनियादी जरूरतों के लिए दर-दर भटक रहा है।
विदारक सत्य: इंदौर के भागीरथपुरा जैसी घटनाएं, जहाँ दूषित पानी पीने से 20-25 लोगों की मृत्यु हो गई, हमारे सिस्टम की विफलता का सबसे बड़ा प्रमाण हैं। डिजिटल इंडिया और तेजी से बढ़ती अर्थव्यवस्था के दौर में “शुद्ध पेयजल” न मिल पाना एक त्रासदी है।
समान अधिकार बनाम जमीनी हकीकत
संविधान का मूल मंत्र ‘समानता’ है, लेकिन संसाधनों पर सभी का समान अधिकार आज भी एक सपना है। जब तक व्यक्तिगत आकांक्षाएं और निजी विचार संवैधानिक मूल्यों पर हावी रहेंगे, तब तक समाज का अंतिम व्यक्ति केवल “अच्छे दिनों” की उम्मीद में टकटकी लगाए खड़ा रहेगा।
विकास और विश्वास की चुनौती
यह सच है कि भारत कई क्षेत्रों में वैश्विक स्तर पर तेजी से विकास कर रहा है और यह गर्व का विषय है। लेकिन वास्तविक विकास वही है जो समतामूलक हो। इसके लिए आवश्यक है:
समतामूलक शासन: जहाँ नीतियां केवल चंद लोगों के लिए नहीं, बल्कि जन-जन के लिए हों।
ईमानदार प्रशासन: जो भ्रष्टाचार मुक्त हो और बुनियादी सुविधाओं (पानी, स्वास्थ्य, शिक्षा) की गारंटी दे।
संवैधानिक निष्ठा: शासन के सभी अंग अपनी सीमाओं में रहकर ईमानदारी से कार्य करें।
संविधान बेबस नहीं है, उसे लागू करने वाली नियत में खोट है। यदि हम चाहते हैं कि गणतंत्र की गरिमा बनी रहे, तो हमें संविधान में निहित प्रावधानों का ईमानदारी से पालन करना होगा। अन्यथा, विकास की चमक में आम आदमी का दर्द कहीं दब कर रह जाएगा।
