वॉशिंगटन/कोपेनहेगन: दुनिया एक अभूतपूर्व कूटनीतिक संकट की दहलीज पर खड़ी है। ग्रीनलैंड को खरीदने या उस पर कब्जा करने की डोनाल्ड ट्रंप की जिद ने अब सैन्य टकराव का रूप ले लिया है। ताजा घटनाक्रम में डेनमार्क और यूरोपीय संघ (EU) ने अमेरिका को दो-तूक चेतावनी देते हुए स्पष्ट कर दिया है कि ‘ग्रीनलैंड बिकाऊ नहीं है’ और इसकी संप्रभुता से कोई समझौता नहीं होगा।
वाइट हाउस में ‘हाई-वोल्टेज’ मीटिंग
अमेरिकी समय के अनुसार बुधवार को वाइट हाउस में एक बेहद अहम बैठक होने जा रही है। इसमें डेनमार्क और ग्रीनलैंड के विदेश मंत्री, अमेरिकी उप-राष्ट्रपति जेडी वेंस और विदेश मंत्री मार्को रूबियो से मुलाकात करेंगे।
यूरोप का रुख: यूरोपीय नेता स्पष्ट करेंगे कि ग्रीनलैंड डेनमार्क के शासन के अधीन ही रहेगा।
ट्रंप की धमकी: यह बैठक तब हो रही है जब राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने ग्रीनलैंड के रणनीतिक महत्व को देखते हुए सैन्य बल के इस्तेमाल की संभावना जताई है।
क्या लागू होगा ‘आर्टिकल 42.7’?
ट्रंप की धमकियों ने यूरोप को ‘वॉर मोड’ में डाल दिया है। यूरोपीय संघ (EU) अब अपनी संधि के आपसी रक्षा क्लॉज (Mutual Defence Clause) को लागू करने पर विचार कर रहा है:
आर्टिकल 42.7: इस क्लॉज के अनुसार, यदि किसी सदस्य देश (जैसे डेनमार्क) पर हथियारों से हमला होता है, तो बाकी सभी सदस्य देश अपनी पूरी सैन्य शक्ति के साथ उसकी मदद करने के लिए बाध्य होंगे।
EU की तैयारी: एक यूरोपीय अधिकारी ने पुष्टि की है कि अगर अमेरिका हमला करता है, तो पूरा यूरोप जंग में उतर सकता है।
खतरे में NATO का अस्तित्व
आर्कटिक क्षेत्र में बढ़ते इस तनाव ने उत्तर अटलांटिक संधि संगठन (NATO) के भविष्य पर भी सवालिया निशान लगा दिए हैं।
NATO का बयान: संगठन ने कहा है कि वह आर्कटिक में सुरक्षा बनाए रखने के लिए “अगले कदमों” पर चर्चा कर रहा है।
दरार: यदि अमेरिका अपने ही NATO सहयोगी (डेनमार्क) पर हमला करता है, तो यह इस सैन्य गठबंधन का अंत हो सकता है।
ग्रीनलैंड क्यों है इतना महत्वपूर्ण?
ग्रीनलैंड न केवल खनिजों और प्राकृतिक संसाधनों से समृद्ध है, बल्कि यह आर्कटिक क्षेत्र में रणनीतिक रूप से अत्यंत महत्वपूर्ण स्थान पर स्थित है। अमेरिका इसे अपनी राष्ट्रीय सुरक्षा और रूस-चीन के बढ़ते प्रभाव को रोकने के लिए जरूरी मानता है।
