A man carries an Iranian flag to place on the rubble of a police facility struck during the U.S.–Israeli military campaign in Tehran, Iran, Wednesday, March 4, 2026. (AP Photo/Vahid Salemi)
— प्रो. देवेन्द्र कुमार शर्मा
ईरान लंबे समय से परमाणु शक्ति संपन्न राष्ट्र बनने की दिशा में अग्रसर है, और उसका यह उद्देश्य सदैव स्पष्ट रहा है—इजरायल के अस्तित्व को चुनौती देना। इसी रणनीति के तहत ईरान ने हमास और हिजबुल्लाह जैसे आतंकी संगठनों को खाद-पानी देकर इजरायल के विरुद्ध मोर्चा खोल रखा है। अमेरिका निरंतर ईरान को परमाणु कार्यक्रम रोकने की चेतावनी देता रहा, किंतु ईरान ने कभी इसकी परवाह नहीं की। धीरे-धीरे जहाँ कई मुस्लिम देशों ने इजरायल के अस्तित्व को स्वीकार कर समझौता कर लिया, वहीं ईरान आज भी उसके लिए सबसे बड़ा खतरा बना हुआ है।
हालिया घटनाक्रम ने स्थिति को विस्फोटक बना दिया है। अमेरिका और ईरान के बीच शांति वार्ता के कई दौर विफल होने के बाद, अंततः अमेरिका ने ईरान के सुप्रीम लीडर अयातुल्ला खामेनेई (लेख के संदर्भानुसार) के विरुद्ध कठोर कदम उठाए, जिसके परिणामस्वरूप अमेरिका-इजरायल और ईरान के बीच भीषण युद्ध छिड़ गया है।
युद्ध का कठिन गणित
हमले से पूर्व ट्रम्प को उनके सैन्य सलाहकारों ने चेतावनी दी थी कि “युद्ध प्रारंभ करना सरल है, किंतु उससे सुरक्षित बाहर निकलना अत्यंत कठिन।” इतिहास इस बात का साक्षी है। रूस-यूक्रेन युद्ध का उदाहरण हमारे सामने है, जहाँ पुतिन ने सोचा था कि सप्ताह भर में विजय मिल जाएगी, किंतु चार वर्ष बाद भी वह युद्ध जारी है। ईरान भी झुकने को तैयार नहीं है। अमेरिका के आकलन के विपरीत ईरान अत्यंत आक्रामकता से युद्ध लड़ रहा है। उसने न केवल इजरायल, बल्कि उन सभी खाड़ी देशों पर भी हमले किए हैं जहाँ अमेरिकी सैन्य ठिकाने मौजूद हैं।
ईरान की मारक क्षमता और ‘ट्रम्प’ की उलझन
ईरान ने अत्याधुनिक मिसाइलों और ड्रोनों का विशाल भंडार एकत्र कर लिया है। उसकी मिसाइलों की मारक क्षमता अमेरिका तक पहुँचने का दम रखती है। ईरान के नए नेतृत्व (अयातुल्ला के पुत्र) ने भी स्पष्ट कर दिया है कि वे समर्पण के बजाय अंतिम सांस तक लोहा लेंगे।
आज स्थिति यह है कि:
ईरानी मिसाइलों के खौफ से अमेरिकी जंगी जहाजों को पीछे हटना पड़ा है।
इजरायल की राजधानी तेल अवीव पर मिसाइलें तबाही मचा रही हैं।
ट्रम्प, जो कभी युद्ध समाप्त कराने का दावा करते थे, अब स्वयं ऐसे दलदल में फँस गए हैं जहाँ से ‘विजेता’ बनकर निकलना असंभव प्रतीत हो रहा है।
घरेलू और वैश्विक प्रभाव
तस्वीरें आ रही हैं कि हताशा में ट्रम्प अब पादरियों की शरण में हैं और कार्यालय में प्रार्थनाएँ आयोजित की जा रही हैं। युद्ध का प्रतिदिन का भारी खर्च अमेरिकी नागरिकों की जेब पर बोझ बन रहा है। ट्रम्प की स्थिति अब “भई गति सांप छछूंदर केरी” वाली हो गई है—वे न तो युद्ध जीत पा रहे हैं और न ही इसे सम्मानजनक तरीके से बंद कर पा रहे हैं।
निष्कर्ष
यूक्रेन पहले से ही जल रहा है और अब खाड़ी देशों में छिड़ा यह ‘मिनी विश्व युद्ध’ वैश्विक अर्थव्यवस्था के लिए घातक सिद्ध हो रहा है। खाड़ी देश युद्ध विराम की कोशिश कर रहे हैं, किंतु ईरान की अदम्य इच्छाशक्ति और अमेरिका की सैन्य जिद ने विश्व को विनाश के मुहाने पर खड़ा कर दिया है। स्पष्ट है कि ट्रम्प ने ईरान की शक्ति का आकलन करने में भारी भूल की है, और अब वे इस युद्ध के चक्रव्यूह में बुरी तरह फँस चुके हैं।
