रतलाम। बदलते दौर में जहाँ दुनिया ‘वैलेंटाइन डे’ के गुलाबी रंग में रंगी नजर आती है, वहीं मालवा के रतलाम में एक अलग ही ‘राग’ सुनाई दे रहा है। यहाँ की नई पीढ़ी यानी ‘Gen-Z’ युवाओं के बीच इस बार वैलेंटाइन के शोर से ज्यादा महाशिवरात्रि की गूँज सुनाई दे रही है। कैफे और रेस्तरां के बजाए युवाओं की टोलियाँ शिवालयों और भजन मंडलियों में महादेव की भक्ति में लीन नजर आ रही हैं।
इश्क नहीं, इबादत का दौर
रतलाम के युवाओं का कहना है कि उनके लिए असली प्रेम और शक्ति का प्रतीक ‘शिव-शक्ति’ का मिलन है। यही कारण है कि 14 फरवरी के आसपास भी शहर के बाजार टेडी बियर और गुलाबों से ज्यादा शिव बारात की तैयारियों, भगवा ध्वजों और डमरू की थाप से सजे दिखे। सोशल मीडिया पर भी ‘कपल गोल्स’ की जगह ‘कैलाशपति’ के स्टेटस और रील्स की धूम मची हुई है।
सांस्कृतिक विरासत की ओर लौटते कदम
यह बदलाव केवल धार्मिक नहीं, बल्कि सांस्कृतिक भी है। रतलाम के विभिन्न मोहल्लों और अखाड़ों से जुड़े युवा दिन-रात शिव बारात के लिए झांकियां सजाने और भजनों का अभ्यास करने में जुटे हैं। स्थानीय जानकारों का मानना है कि अपनी जड़ों और परंपराओं के प्रति युवाओं का यह आकर्षण एक सकारात्मक संकेत है, जहाँ वे आधुनिकता के साथ-साथ अपनी संस्कृति को भी गर्व से अपना रहे हैं।
भक्ति के रंग में रंगा शहर
रेलवे स्टेशन स्थित त्रिभुवन नाथ मंदिर हो या प्राचीन झरादैश्वर महादेव, हर जगह युवाओं की सक्रिय भागीदारी देखी जा रही है। आयोजन समितियों में अब युवा चेहरे प्रमुखता से नजर आ रहे हैं, जो न केवल व्यवस्थाएं संभाल रहे हैं बल्कि पारंपरिक वाद्य यंत्रों के साथ शिव की आराधना भी कर रहे हैं।
रतलाम का यह ‘राग’ बताता है कि श्रद्धा जब आधुनिकता से मिलती है, तो भक्ति का स्वरूप और भी भव्य हो जाता है। वैलेंटाइन के इस दौर में रतलाम के युवाओं ने यह साबित कर दिया है कि उनके दिल में ‘प्रेम’ से बड़ा स्थान ‘आस्था’ का है।
