जावरा। कुदरत की मार भी धनवीर के हौसलों को डिगा नहीं सकी। जावरा के ढोढर बस्ती निवासी मनीष सुनावा का पुत्र धनवीर, जन्म से बोलने और सुनने की शक्ति से वंचित है, लेकिन उसकी उंगलियों में वो जादू है जो बेजान कागज़ पर भी जान फूंक देता है। वह अपनी कला के माध्यम से दुनिया को एक नया नजरिया दिखाना चाहता है।
संघर्ष से सफलता तक का सफर
जब धनवीर का जन्म हुआ, तो परिवार में खुशियों का माहौल था। लेकिन जैसे-जैसे वह बड़ा हुआ, माता-पिता को अहसास हुआ कि उनका बेटा न बोल सकता है और न सुन सकता है। इस खबर ने परिवार पर दुखों का पहाड़ तोड़ दिया। माता-पिता ने बड़े डॉक्टरों को दिखाया, मंदिरों में मन्नतें मांगी और दुआएं कीं, पर कोई बदलाव नहीं आया। अंततः, परिजनों ने इसे नियति मानकर धनवीर के लालन-पालन और उसकी विशिष्ट क्षमताओं पर ध्यान केंद्रित किया।
अपनी शारीरिक सीमाओं को चुनौती देते हुए धनवीर ने अपनी कुशाग्र बुद्धि के दम पर कक्षा 10वीं उत्तीर्ण की है। पढ़ाई में उसकी गहरी रुचि को देखते हुए परिजनों ने उसे आगे भी पढ़ाने का संकल्प लिया है।
हुबहू स्केच बनाने में महारत
धनवीर भले ही शब्दों का सहारा नहीं ले सकता, लेकिन वह इशारों में सब कुछ समझता है और अपनी भावनाओं को चित्रों में उतार देता है। उसकी सबसे बड़ी विशेषता यह है कि वह किसी भी व्यक्ति को देख कर उसका हुबहू (Exact) स्केच बना सकता है। उसकी बनाई पेंटिंग्स देखकर कोई भी दंग रह सकता है।
- विविधता: वह केवल चेहरे ही नहीं, बल्कि दुपहिया-चौपहिया वाहनों, पशु-पक्षियों और प्रकृति के सजीव चित्र बनाने में भी माहिर है।
- कला ही आवाज: उसकी चित्रकारी ही उसकी पहचान और उसकी आवाज बन गई है।
माता-पिता का संबल
धनवीर की इस सफलता के पीछे उसके माता-पिता का अटूट सहयोग है। उन्होंने धनवीर की अक्षमता को उसकी कमजोरी नहीं बनने दिया, बल्कि उसकी प्रतिभा को पहचानकर उसे निरंतर आगे बढ़ने के लिए प्रेरित किया। धनवीर का कौशल यह साबित करता है कि अगर दृढ़ इच्छाशक्ति हो, तो कोई भी बाधा कला के मार्ग में नहीं आ सकती।
